उत्तराखंड में शराब की दुकानों के आवंटन को लेकर आबकारी विभाग एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आरोप है कि कैबिनेट मंत्री के करीबी लोगों और उनके स्टाफ से जुड़े व्यक्तियों को नियमों को दरकिनार कर शराब की दुकानें आवंटित की गईं। मामले की सुनवाई नैनीताल हाईकोर्ट में चल रही है, जहां फिलहाल विवादित दुकानों के लाइसेंस पर रोक लगी हुई है।

मामला देहरादून की राजपुर रोड और परेड ग्राउंड क्षेत्र की शराब दुकानों से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि वर्ष 2025-26 में जिन लाइसेंस धारकों के पास ये दुकानें थीं, उन्होंने आबकारी नीति के तहत 16 फरवरी तक लाइसेंस नवीनीकरण के लिए आवेदन करने का प्रयास किया, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने उनका आवेदन स्वीकार नहीं किया।

आरोप है कि आबकारी नीति के अनुसार यदि लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं होता है तो दुकानों को पहले लॉटरी प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए था और उसके बाद भी आवंटन न होने पर ‘पहले आओ-पहले पाओ’ व्यवस्था लागू की जानी चाहिए थी। लेकिन इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि 17 फरवरी को विवादित दुकानों का आवंटन सीधे तौर पर एक कैबिनेट मंत्री के करीबी लोगों को कर दिया गया। मामले के हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अदालत ने संबंधित दुकानों के संचालन पर रोक लगा दी और स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय तक दुकानें संचालित नहीं होंगी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मूल रिकॉर्ड और दस्तावेज भी तलब किए हैं। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि दुकानों के आवंटन के लिए आबकारी नीति में मनमाने ढंग से बदलाव या छेड़छाड़ तक की गई। अब मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष होने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि आरोपों में कितनी सच्चाई है

और आबकारी विभाग ने नियमों का पालन किया या नहीं।यह स्क्रिप्ट टीवी न्यूज़ पैकेज के हिसाब से तैयार की गई है और इसमें सभी प्रमुख आरोप, कोर्ट की कार्रवाई, स्टे ऑर्डर और अगली सुनवाई का पूरा संदर्भ शामिल है।


