क्या प्रशासनिक अमला किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? या फिर इंसानी जिंदगियों का सौदा एक बार फिर चंद फायदों के लिए किया जा रहा है?दिल्ली-हरिद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित बढेड़ी राजपूताना का वही इलाका, जहां पूर्व में ‘अरुण देव सिटी’ के नाम पर सैकड़ों लोगों का सपना नदी के उफान में बह गया था… अब उसी खौफनाक जमीन पर एक नया नाम उभरा है— ‘Riverside City’।

इतिहास गवाह है कि मानसून के दौरान जब पहाड़ी क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश होती है, तो यह रतमऊ नदी किसी अजगर की तरह फुंकारती है। फ्लैश फ्लड के दौरान इस नदी का पानी कैचमेंट एरिया की सीमाओं को तोड़कर सीधे बढेड़ी राजपूताना के मैदानी इलाकों में तबाही मचाता है। पूर्व में भी जब यहां कॉलोनी काटी गई थी, तब नदी की उग्र धाराओं ने सड़कें, बाउंड्री वॉल और निर्माणाधीन मकानों को तिनके की तरह बहा दिया था।खरीदारों की गाढ़ी कमाई पानी में डूब गई थी। मामला उपभोक्ता फोरम और अदालतों तक पहुंचा, जहां बिल्डर पर भारी जुर्माने लगे, मुआवजे के आदेश हुए और अवैध निर्माण पर चाबुक चला। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमने उस आपदा से कोई सबक सीखा?

सवाल यह है कि क्या नेशनल ग्रीन (NGT) के उन सख्त नियमों को हवा में उड़ा दिया गया है, जो नदी के फ्लड प्लेन में निर्माण को प्रतिबंधित करते हैं? और क्या हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण और स्थानीय प्रशासन की आंखों के सामने यह नई प्लॉटिंग हो रही है? अंतिम सवाल है यदि कल को भारी मानसून में रतमऊ नदी फिर विकराल रूप लेती है और जन-धन की हानि होती है, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा वे बिल्डर जो नया नाम बदलकर जमीन बेच रहे हैं, या वे अधिकारी जो खामोश बैठकर तमाशा देख रहे हैं?

नदी किनारे Riverside City’ के नाम से शुरू हुआ यह नया खेल केवल प्रॉपर्टी डील नहीं, बल्कि सीधे-सीधे आपदा को दावत देना है। पहाड़ी नदियों का मिजाज पलक झपकते बदलता है और बरसात में इनका प्रवाह किसी भी पक्के ढांचे को जमींदोज करने की ताकत रखता है।
अगर आज जिम्मेदार विभागों ने समय रहते कार्रवाई नहीं की, तो कल फिर कई परिवारों की उम्र भर की कमाई इस रतमऊ नदी की उफान में समा जाएगी। जनता को भी ऐसे चमकते विज्ञापनों और नदी किनारे के लुभावने वादों से सावधान रहने की जरूरत है।


