उत्तराखंड के रुड़की से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विकास के नाम पर हो रहे पर्यावरण के विनाश और प्रशासनिक अनदेखी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रुड़की के बहादुरपुर सैनी गांव के जंगलों में बिल्डरों ने पहले तो किसानों से फलदार बाग कौड़ियों के दाम खरीदे, और फिर उन पर बेदर्दी से आरियां चला दी गईं। हैरान करने वाली बात यह है कि जिन आम के बागों को उजाड़ा गया, आज उन्हीं जमीनों पर ‘मैंगो फार्म हाउस’ के नाम से करोड़ों के विला बेचे जा रहे हैं। आखिर इस पूरे खेल में प्रशासन मौन क्यों रहा? देखिए हमारी यह खास ग्राउंड रिपोर्ट…

विकास की इस चमक-दमक के पीछे तबाही और पर्यावरण से खिलवाड़ का एक बड़ा खेल छिपा है। यह तस्वीरें हैं रुड़की के बहादुरपुर सैनी गांव के जंगलों की, जहां कभी आम के हरे-भरे फलदार बाग हुआ करते थे। बिल्डरों ने पहले किसानों को झांसा देकर और औने-पौने दामों में इन उपजाऊ बागों को खरीदा। इसके बाद शुरू हुआ कत्लेआम का दौर, सैकड़ों हरे-भरे पेड़ों पर बिना किसी खौफ के आरियां चला दी गईं। जिस जगह पर कभी पर्यावरण को ऑक्सीजन देने वाले पेड़ लहराते थे,

आज वहां कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दिया गया है। विडंबना देखिए… जिन आम के बागों को उजाड़कर ये विला तैयार किए गए, उसी नाम को भुनाने के लिए इस प्रोजेक्ट को ‘मैंगो फार्म हाउस’ का नाम दे दिया गया। एक ही रास्ते पर आगे-पीछे ऐसे तीन अलग-अलग स्थान विकसित कर दिए गए हैं।लेकिन खेल सिर्फ पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण से लेआउट केवल एक छोटे से हिस्से का पास कराया गया था, जबकि मौके पर बहुत बड़े क्षेत्रफल में अवैध रूप से प्लॉटिंग कर लग्जरी विला खड़े कर दिए गए। अब जरा इस पूरे खेल की कीमत भी समझिए एक विला की कीमत लगभग 1 करोड़ से लेकर ढाई करोड़ रुपये तक तय की गई है।

लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल क्षेत्रीय प्रशासन और संबंधित विभाग पर उठता है पहला सवाल है कि जब हरे-भरे आम के बागों को उजाड़ा जा रहा था, तब क्षेत्रीय प्रशासन और वन विभाग की आंखें क्यों बंद थीं? सवाल यह भी खड़ा होता है कि मौके पर HRDA के स्वीकृत लेआउट से ज्यादा क्षेत्र में प्लॉटिंग और निर्माण होता रहा, पर विभाग को इसकी भनक तक क्यों नहीं लगी? और क्या यह सब बिना प्रशासनिक शह या लापरवाही के मुमकिन था?रुड़की के बहादुरपुर सैनी का यह ‘मैंगो फार्म हाउस’ प्रोजेक्ट इस बात का जीता-जागता सबूत है कि कैसे चंद पैसों के फायदे के लिए पर्यावरण की बलि चढ़ाई जा रही है।

नियमों को ताक पर रखकर बनाए गए इन करोड़ों के विला पर अब सवाल उठने लाजमी हैं। देखना यह होगा कि खबर सामने आने के बाद जिम्मेदार विभाग इस अवैध निर्माण और पेड़ों की कटाई पर क्या कार्रवाई करता है या मामला ठंडे बस्ते में ही दबा रहेगा।

