उत्तराखंड इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट डेवलपमेंट बोर्ड यानी यूआईआईडीबी को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार ने सफाई दी है। वहीं, पूर्व विधायक केदारनाथ मनोज रावत ने सरकार के दावों पर सवाल खड़े किए हैं।नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव एवं यूआईआईडीबी के प्रबंध निदेशक आर. मीनाक्षी सुंदरम ने स्पष्ट किया कि यूआईआईडीबी को 7,000 बीघा भूमि आवंटित किए जाने की जानकारी तथ्यात्मक रूप से गलत है। उन्होंने बताया कि अब तक बोर्ड को केवल 45 एकड़ भूमि उपलब्ध हुई है। सरकार का कहना है कि यूआईआईडीबी का उद्देश्य पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, वेलनेस, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेवा क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देना है।प्रमुख सचिव के मुताबिक, सरकारी भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार के पास ही रहेगा और निवेश परियोजनाओं के लिए भूमि का उपयोग नियमानुसार लीज मॉडल पर किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि लीज की अवधि 60 वर्ष है, 90 वर्ष नहीं। सरकार का दावा है कि इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर बढ़ेंगे।वहीं, पूर्व विधायक केदारनाथ मनोज रावत ने प्रमुख सचिव के बयान पर सवाल उठाते हुए कहा कि वर्ष 2023 में विधानसभा से यूआईआईडीबी एक्ट पारित होने के बाद मुख्य सचिव स्तर पर गठित अनुशंसा समिति ने अब तक कितनी भूमि के हस्तांतरण की सिफारिश की है और उसमें से कितनी भूमि पर मुख्यमंत्री की अंतिम स्वीकृति मिल चुकी है, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।मनोज रावत ने दावा किया कि विभागीय दस्तावेजों के अनुसार लगभग 1,200 एकड़ भूमि पर मुख्यमंत्री की स्वीकृति मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि यह भूमि आगे यूआईआईडीबी या किसी अन्य विभाग को हस्तांतरित की जा सकती है। साथ ही आरोप लगाया कि यूआईआईडीबी के माध्यम से हस्तांतरित की जा रही भूमि और संपत्तियों को बड़े निवेशकों को देने की रणनीति बनाई गई है।सरकार का कहना है कि यूआईआईडीबी और वर्ष 2022 में गठित ऑप्टिमल लैंड यूटिलाइजेशन कमेटी अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं और सभी प्रक्रियाएं नियमों एवं पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप संचालित की जा रही हैं।
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Friday, October 30

