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    Home»देश»जिन 13 सांसदों की NDA और INDIA दोनों से दूरी, उनका राजनीतिक झुकाव किस तरफ?
    देश

    जिन 13 सांसदों की NDA और INDIA दोनों से दूरी, उनका राजनीतिक झुकाव किस तरफ?

    Social ScanBy Social ScanJune 24, 2024Updated:January 7, 2026No Comments7 Mins Read
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    आज 18वीं लोकसभा के पहले सत्र का आगाज हो गया. एनडीए 293 सांसदों के साथ एक ओर बैठी दिखी तो पिछले एक दशक के दौरान काफी हद तक भटका और अपने अंतर्विरोधों के कारण बिखरा विपक्ष इस बार इंडिया गठबंधन के बैनर तले एक संगठित और मजबूत भूमिका में दिखलाई दिया. वैसे तो इंडिया ब्लॉक से 20 सहयोगी दलों के 234 सांसद जीते थे लेकिन 3 निर्दलीय सांसदों के समर्थन मिल जाने से इनकी संख्या 237 पहुंच गई है. यानी सरकार और विपक्षी गठबंधन के बीच 56 सीटों का फासला रह गया है.

    एनडीए के खेमे में गठबंधन की राजनीति के धुरंधर नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू के 28 सांसदों के बैठे होने से भारतीय जनता पार्टी के लिए अपने मन मुताबिक सदन चलाना आसान नहीं होगा. ये इसलिए भी क्योंकि इस दफा भारतीय जनता पार्टी के पास उन राजनीतिक दलों या सांसदों के समर्थन जुटा लेने की भी गुंजाइश नहीं है जिनकी ताकत के दम पर वह सदन में न सिर्फ हौले से इतराती थी बल्कि कोई भी बिल बेहद आसानी से पास करा लिया करती थी.

    BJD, BRS, BSP, ADMK साफ, YSRCP की मुश्किलें

    मसलन, मोदी सरकार के लिए संसद में कई दफा राह हमवार करने वाली बीजू जनता दल इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी के ही हाथों साफ हो गई है. उसके एक भी उम्मीदवार लोकसभा नहीं पहुंच पाए हैं. वाईएसआरसीपी; जिसने अनुच्छेद 370, सीएए, कृषि कानून जैसे विवादित विषयों पर बीजेपी का साथ दिया, इस चुनाव में बीजेपी के ही गठबंधन से मात खा गई.

    ऐसे में, जगन रेड्डी की पार्टी (वाईएसआरसीपी) के पास न तो वह राजनीतिक हैसियत है कि वह संख्या बल को बहूत हद तक बना-बिगाड़ पाए. और जो थोड़ी-बहुत है भी वह बीजेपी को समर्थन देने से बचेगी क्योंकि यह उसकी घरेलू राजनीति के लिहाज से ठीक नहीं होगा. भारत राष्ट्र समिति, बहुजन समाज पार्टी, एआईएडीएमके जैसी पार्टियां, जो कभी-कभार भाजपा के लिए कभी-कभार थोड़ी नरम रहीं, वह इस दफा लोकसभा से पूरी तरह गायब हैं.

    जिन 13 सांसदों की NDA, INDIA से दूरी, वहां BJP के लिए गुंजाइश कितनी

    जो न तो सरकार के साथ हैं और ना ही इंडिया गठबंधन के साझेदार, ऐसे सांसदों की संख्या 13 है. इनमें 4 आंंध्र प्रदेश, 3 पंजाब, 2 उत्तर पूर्व और 1-1 जम्मू कश्मीर, लद्दाख, बिहार और तेलंगाना से चुनकर संसद पहुंचे हैं. जब सत्ता पक्ष और विपक्ष का आंकड़ा इतना करीब हो तो इनकी सदन में मौजूदगी किसी विवादित विधेयक को पारित करते समय लोकसभा के नंबर गेम को दिलचस्प बना सकती है.

    इनमें से ज्यादातर सांसदों की राजनीतिक पृष्ठभूमि और झुकाव को देखते हुए बीजेपी इनके समर्थन से कुछ मामलों में तो बचेगी और कुछ मामलों में शायद संभव भी नहीं होगा. क्योंकि इनमें से 7 सांसद तो सीधे तौर पर एनडीए के प्रत्याशी को हराकर लोकसभा पहुंचे हैं. वहीं जिन 5 ने इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों को हराया है, उनकी सीटों पर भाजपा के लिए माहौल ठीक नहीं रहा है. ऐसे में यहां के सांसद भी बीजेपी को समर्थन देने से बचेंगे.

    YSRCP के चार सांसद क्यों दिखा सकते हैं दूरी?

    किसी मुद्दे पर वाईएसआरसीपी के चार सांसदों का समर्थन लेना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि वह आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाईएसआरसीपी की धुर विरोधी तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ गठबंधन में है.

    वाईएसआरसीपी चुनाव के दौरान आंध्र प्रदेश में हुई हिंसा को लेकर चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली टीडीपी पर आरोप लगा रही है. ऐसे में, टीडीपी के समर्थन से सरकार चला रही बीजेपी के लिए वाईएसआरसीपी से दूरी बनाए रखना ही फायदे का सौदा होगा.

    केन्द्र में भले कुछ देर के लिए उसके हित सध जाएं लेकिन राज्य की राजनीति में टीडीपी-बीजेपी-जनसेना पार्टी का हिसाब-किताब ‘गड़बड़ा’ सकता है. हां, संवेदनशील विषयों पर वाईएसआरसीपी का रुख क्या इंडिया गठबंधन की तर्ज पर होगा, यह अभी साफ नहीं है.

    निर्दलीय सभी सांसद भाजपा का करेंगे विरोध?

    इस लोकसभा चुनाव में कुल 7 सांसद निर्दलीय चुने गए. इनमें 3 ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया है. चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में अपनी पार्टी का विलय कर देने वाले मगर पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले पप्पू यादव, महाराष्ट्र की सांगली सीट से कांग्रेस से बागी होकर चुनाव जीतने वाले विशाल पाटिल और लद्दाख से जीतने वाले मोहमद हनीफा ने विपक्ष की तरफ से बैटिंग करने की बात की है.

    मगर पंजाब की खदूर साहिब सीट से नवनिर्वाचित सांसद अमृतपाल सिंह, फरीदकोट से सांसद सरबजीत सिंह खालसा को लेकर चीजें स्पष्ट नहीं हैं. अमृतपाल सिंह कांग्रेस के प्रत्याशी कुलबीर सिंह जीरा को हराकर जबकि सरबजीत खालसा आम आदमी पार्टी के करमजीत सिंह अनमोल को हराकर संसद पहुंचे हैं. बीजेपी के प्रत्याशी इन दोनों सीटों पर पांचवे नंबर पर रहें. यानी यहां के लोगों ने भाजपा को सिरे से खारिज किया है.

    ऐसे में, खालसा और अमृतपाल, दोनों ही अपनी संसदीय इलाके के जनमानस की आवाज की अनदेखी नहीं करना चाहेंगे. हालांकि, एक तथ्य यह भी है कि अमृतपाल के खालिस्तान को लेकर जिस तरह के विचार हैं, उससे बीजेपी क्या विपक्ष भी सदन के बाहर और भीतर अमृतपाल से गुरेज करेंगा.इसी तरह सरबजीत सिंह खालसा की जैसी पृष्ठभूमि रही है और उनकी जीत को जिस तरह पंथिक राजनीति का उभार कहा जा रहा, दोनों गठबंधन इनके कट्टर विचारों से दूरी बरत सकते हैं.

    लेकिन यहीं एक चीज गौर करने वाली ये है कि संसद में चूंकि वोट सरकार के समर्थन और खिलाफ में पड़ता है, न की विपक्ष के पक्ष और खिलाफ में.विपक्ष इनका समर्थन हासिल न करते हुए भी इन्हें बीजेपी के खिलाफ में वोट करता हुआ पा सकता है.

    ऐसे ही, जम्मू कश्मीर की बारामूला सीट से पूर्व मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला को रिकॉर्ड 2 लाख वोटों से हराने वाले अब्दुल राशिद शेख उर्फ इंजीनियर राशिद का भी लगभग तय है कि वह बीजेपी की लाइन के खिलाफ ही अपना रुख रखेंगे. इंजीनियर राशिद जम्मू कश्मीर टेरर फंडिग मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार हैं और फिलहाल जेल में हैं.

    निर्दलीय सांसदों की कड़ी में दमन-दीव ही इकलौती ऐसी सीट है, जहां से जीतने वाले निर्दलीय सांसद उमेश भाई पटेल से भाजपा अपने समर्थन में वोट की अपील कर सकती है. लेकिन बीजेपी के लिए शायद ये आसान हो, उमेश भाई पटेल के लिए भाजपा का समर्थन कठिन होगा. क्योंकि इनकी अधिकतर राजनीति दमन-दीव और दादरा-नागर हवेली के एडमिनिस्ट्रेटर (प्रशासक) प्रफुल खोड़ा पटेल और जीत की हैट्रिक लगाने वाले बीजेपी के लालूभाई पटेल के खिलाफ रही है.

    अन्य – 5 (ओवैसी, बादल, आजाद और उत्तर पूर्व के दो नाम)

    हैदराबाद से चुने वाले असद्दुदीन ओवैसी की आवाज एक लोकसभा सीट के सांसद से कहीं ज्यादा सुनी और पढ़ी जाती है. इसकी वजह है उनका अकलियत आवाम खासकर मुसलमानों के बारे में खुलकर बात करना. वह भाजपा और मोदी सरकार के मुखर आलोचक रहे हैं. ऐसे में, बीजेपी के लिए यहां गुंजाइश बिल्कुल भी नहीं होगी.

    उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से जीतने वाले चंद्रशेखर आजाद को हिंदी पट्टी में दलित राजनीति के नए चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है. जिस तरह बीते आम चुनाव में मायावाती पर भाजपा के साथ सांठगांठ के आरोप लगे, चंद्रशेखर अपनी राजनीति के शुरुआती दिनों ही में भाजपा को अपना समर्थन दे अपनी पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहेंगे.

    इसी तरह मेघालय की नई नवेली वॉइस ऑफ द पीपल पार्टी (वीपीपी) अल्पसंख्यकों के अधिकार की बात करती है. इस पार्टी के रिक्की सिंग्कोन शिलॉन्ग लोकसभा सीट से सांसद चुने गए हैं. वीपीपी का भी भाजपा को समर्थन देना लगभग नामुमकिन है.उसके अध्यक्ष अर्डेन्ट मिलेर ने केन्द्र में गठबंधन या समर्थन के सवाल पर कहा था कि हम भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए को समर्थन नहीं करेंगे. वीपीपी विपक्षी खेमे में तो बैठेगी लेकिन इंडिया ब्लॉक से दूरी बरतेगी.

    मिजोरम से सांसद चुने गए सत्ताधारी जोरम पीपल्स मूवमेंट के रिचर्ड वनलाल्हमंगाइहा ने मिजो नेशनल फ्रंट को हराया है. चूंकि मिजोरम में ईसाई आबादी बहुसंख्यक हैं और मिजो समुदाय के ठीक-ठाक मतदाता भारतीय जनता पार्टी को एक हिंदुत्त्व की राजनीति करने वाली पार्टी मानते हैं, जोरम पीपल्स मूवमेंट बहुत हद तक भाजपा से दूरी बनाने की ही कोशिश करती दिखेगी.

    हां, शिरोमणि अकाली दल से इकलौती सांसद चुनी गईं हरसीमरत कौर बादल से जरुर बीजेपी को कुछ उम्मीद होगी, जिनकी पार्टी से भाजपा का गठबंधन इस लोकसभा चुनाव में नहीं हो सका. किसानों और पंथिक राजनीति के कुछ सवालों पर दोनों दलों की राय अलग रही है लेकिन दिल्ली में जरुरत पड़ने पर शिरोमणि अकाली दल भाजपा के बजाय विपक्षी खेमे को चुनेगी, थोड़ा असंभव लगता है.

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