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    Home»राज्य समाचार»मध्यप्रदेश»मप्र का बजट: वोटबैंक को साधने की बजाय ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति पर किया जाए अमल
    मध्यप्रदेश

    मप्र का बजट: वोटबैंक को साधने की बजाय ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति पर किया जाए अमल

    Social ScanBy Social ScanJuly 1, 2024Updated:January 7, 2026No Comments6 Mins Read
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    जबलपुर। मुख्यमंत्री डा़ मोहन यादव के नेतृत्व में बनी सरकार मार्च में अपना अंतरिम बजट पेश कर चुकी है। अंतरिम बजट चार माह के खर्च चलाने का लेखा-जोखा मात्र था, लेकिन इसके जरिए मुख्यमंत्री डा़ मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत के संकल्प को साकार करने की दिशा में एक कदम बढ़ाया था।

    राज्य के विकास के लिए 4 हजार से ज्यादा सुझाव दिए हैं

    अब अगले कुछ साल प्रदेश में कोई बड़ा चुनाव नहीं है, ऐसे में इस बार का बजट लोकलुभावन रहने की संभावना कम ही है। बजट से पहले राज्य के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने आम जनता और विशेषज्ञों से राय भी ली है। इन लोगों ने वित्त मंत्री देवड़ा को राज्य के विकास के लिए 4 हजार से ज्यादा सुझाव दिए हैं। इन सुझावों को कितना माना जाता है, ये बजट आने के बाद ही पता चलेगा।

    मुख्यमंत्री ने मोदी की गांरटी को लेकर जितने वादे किए थे

    राज्य बजट को लेकर हर वर्ग उत्साहित है। विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान मुख्यमंत्री ने मोदी की गांरटी को लेकर जितने वादे किए थे, लोगों को उनका पूरा होने की उम्मीद है। इस बार लोगों को लग रहा है कि बजट में लोकलुभावन घोषणाएं नहीं बल्कि योजनाओं को लागू करने का रोडमैप पेश किया जाएगा। इस बजट से युवाओं को रोजगार के साथ स्वरोजगार का प्रशिक्षण की उम्मीद है तो पेंशनर व नौकरीपेशा अपनी लंबित समस्याओं का समाधान चाहते हैं।

    महिला सशक्तीकरण के नारे तो सरकार बुलंद कर रही

    आधी आबादी को लगता है कि महिला सशक्तीकरण के नारे तो सरकार बुलंद कर रही है, लेकिन विसंगतियों के चलते विभिन्न योजनाओं का न लाभ मिल पा रहा है और न ही हिंसा व उत्पीड़न दूर हो सका है। किसान तकनीक के साथ कदमताल जरूरी समझने लगे हैं, उनका जैविक खेती की तरफ रुझान है, बशर्ते सरकारी स्तर पर उन्हें और प्रोत्साहन मिले। मुख्यमंत्री ने श्रीअन्न का समर्थन मूल्य भी तय कर दिया है, बजट में इसके लिए राशि का प्रविधान होने की भी उम्मीद है।

    प्राथमिकता के आधार पर विभागों को राशि

    बजट में केंद्रीय योजनाओं के लिए प्राथमिकता के आधार पर विभागों को राशि आवंटित की जाएगी। कर्मचारियों का महंगाई भत्ता और पेंशनरों की महंगाई राहत बढ़ाने, अन्य पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग के विद्यार्थियों की छात्रवृत्ति, सिंचाई और सड़क परियोजनाओं के साथ अन्य योजनाओं के लिए भी प्रविधान किए जा रहे हैं।

    विपक्ष भी हमलावर बोले-जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा

    बजट को लेकर विपक्ष भी हमलावर हो रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ मोहन सरकार को चुनाव में किए वादे याद दिला रहे हैं। वे कह रहे हैं कि जो वादा किया, वो निभाना पड़ेगा। बजट में उन घोषणाओं के लिए अवश्य प्रविधान कर लें जो विधानसभा चुनाव में की थीं। विपक्ष के अन्य कई नेता भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं।

    लाड़ली बहनों को तीन हजार रुपये तक करना आसान नहीं है

    ये भी उतना ही सच है कि भाजपा ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव में जनता से कई वादे किए थे। सबसे बड़ा वादा लाड़ली बहनों को दी राशि को तीन हजार रुपये महीना करने का है। इस वादे के लिए सरकार को राशि का प्रबंध करना है। अभी लाड़ली बहनों को 1250 रुपये हर माह मिल रहा है। इसे तीन हजार रुपये तक करना आसान नहीं है।

    कर्ज को लेकर भी विपक्ष सरकार को घेरना नहीं भूलता

    कांग्रेस सरकार को अपना ये वादा भी समय-समय पर याद दिलाती रहती है। सरकार पर बढ़ते कर्ज को लेकर भी विपक्ष सरकार को घेरना नहीं भूलता है। बजट को लेकर लोगों ने जो सुझाव दिए है, उनसे पता चलता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और स्वास्थ्य के मुकाबले शिक्षा व रोजगार प्रदेशवासियों के लिए सबसे जरूरी हैं। बजट में शिक्षा व रोजगार सेक्टर को ध्यान में रखना अतिआवश्यक है।

    रोजगार के अभाव में ग्रामीणों को पलायन करना पड़त

    शैक्षणिक गुणवत्ता संग रोजगार के अवसर बढ़ाने की कार्ययोजना बनाने की भी जरूरत है। रोजगार के अभाव में ग्रामीणों को पलायन करना पड़ता है। अपना गांव-घर-परिवार छोड़कर अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है। कई जिलों में यह समस्या है। गांवों में रोजगारपरक प्रशिक्षण शुरू हो जाएं तो कई युवा अपना स्वंय का व्यापार खोल सकते हैं।

    सरकारी स्तर पर दावे तो खूब किए जाते हैं लेकिन…

    प्रदेश के युवाओं की सबसे बड़ी पीड़ा है कि रोजगार को लेकर सरकारी स्तर पर दावे तो खूब किए जाते हैं लेकिन हर बार बजट में निराशा झलकती है। सरकार को बजट में युवाओं के लिए नई योजनाओं का प्रविधान करना चाहिए। इससे पलायन भी कम हो सकता है। बजट में लोकलुभावन घोषणाएं के लिए राशि का प्रविधान किया जाना सामान्य प्रकिया है, पर ये राशि सिर्फ वोटबैंक को ध्यान में रखकर नहीं दी जाए।

    सबका साथ, सबका विकास को ध्यान में रखकर किए जाएं

    बजट में जो भी प्रविधान किए जाएं, वे सबका साथ, सबका विकास को ध्यान में रखकर किए जाएं। बजट सिर्फ जनता को खुश करने के लिए नहीं बल्कि विकसित और आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश की नींव रखने वाला हो। उम्मीद है कि तीन जुलाई को पेश हो रहे मध्य प्रदेश के बजट में मोहन सरकार इन बातों का विशेष ध्यान रखेगी।

    कर्ज के बोझ से चल रहीं योजनाएं

    मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार बड़े कर्ज में डूबी हुई है। फ्री योजनाओं को चलाने के लिए सरकार को यह भारी भरकम कर्ज लेने की जरूरत पड़ रही है। मध्य प्रदेश का बढ़ता हुआ कर्ज किसी दिन वहां के सरकारी कर्मचारियों के वेतन भी रोक सकता है। सैलेरी भी बंद कर सकता है क्योंकि फिलहाल मध्य प्रदेश के कुल बजट का आठवां हिस्सा कर्ज और किस्त में चला जाता है।

    वर्तमान में 3 लाख 50 हजार करोड़ रुपये का कर्ज

    मोहन सरकार पर वर्तमान में 3 लाख 50 हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। राज्य सरकार 88450 करोड़ का कर्ज फिर लेने जा रही है, इसमें से 73540 करोड़ रुपया बाजार से और 15000 करोड़ रुपया केंद्र सरकार से कर्ज लेगी। वर्ष 2024 में 23 जनवरी को 2 हजार 500 करोड़ रुपये, 6 फरवरी को 3000 करोड़ रुपये और 20 फरवरी को 5000 करोड़ रुपये और 27 फरवरी को 5000 करोड़ रुपये का कर्ज पहले ही लिया जा चुका है।

    राजकोषीय घाटा लगभग एक लाख करोड़ के करीब

    पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लाड़ली बहना योजना की घोषणा की थी और इसके बाद चुनाव में भी कई घोषणाएं की गईं, जिसमें 100 यूनिट तक की सस्ती बिजली भी शामिल है। इन दोनों ही घोषणाओं को जोड़ लें तो लगभग 18000 करोड़ रुपये लाड़ली बहना योजना में और 5500 करोड़ रुपया सस्ती बिजली में खर्च हो रहा है।इसके अलावा दूसरी योजनाओं के साथ राजकोषीय घाटा लगभग एक लाख करोड़ के करीब हो जाता है। कर्ज से लोकलुभावन योजनाएं चलाने के बजाय सरकार को अपनी आय बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए।

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