उत्तराखंड सरकार सरकारी स्कूलों में अब पारंपरिक भोजन का प्रशिक्षण दे रही बच्चों को तो वही उत्तरकाशी के
राजकीय इंटर कॉलेज कंडारी, नौगांव (उत्तरकाशी) की छात्राओं द्वारा गृह विज्ञान प्रयोगात्मक परीक्षा में तैयार किए गए गढ़ भोज की खुशबू से विद्यालय महक उठा। बालिकाओं ने ऐसे व्यंजन तैयार किया कि पूरा परिसर पहाड़ की परंपराओं, रंगों और स्वाद से भर गया।
गेहूं- चावल के आटे और काले तिल- गुड़ से बने उल्वे, बीड़ों के साथ पिनवे, लगड़ी, असके, हरसे, पीले कद्दू का रायता, भात, पहाड़ी मोटी दाल, कोदे की रोटी, सिलबट्टे में पीसी गई भट्ट- अलमोड़ा- तिल- पोदिने आदि की चटनियां और चाय की बर्फी आदि कई व्यंजन परोसे गए।
विद्यालय के प्रधानाचार्य नरेश रावत ने बताया कि इन पकवानों ने पुराने दिनों की याद ताज़ा कर दी है। पौराणिक परंपराओं को सहेजकर, उन्हें नई पीढ़ी के माध्यम से आगे तक बढ़ाना बहुत ज़रूरी है। ऐसे आयोजनों से गढ़ भोज की इस परंपरा को विद्यालय व जनपद स्तर से लेकर राज्य स्तर तक प्रचार- प्रसार से भी बल मिलेगा।
शिक्षक अनिल बहुगुणा ने कहा कि छात्राओं ने जो स्थानीय पकवान तैयार किये हैं, वो बहुत स्वादिष्ट बनाए हैं। जब हम अपने स्थानीय उत्पादों को अपनाएंगे, तभी आत्मनिर्भर भारत की नींव मजबूत होगी। उक्त आयोजन के संयोजक शिक्षक सुरक्षा रावत ने “जाड़ी संस्था” के द्वारिका प्रसाद सेमवाल एवं छात्र-छात्राओं सहित सभी का आभार व्यक्त किया। उन्होंने बच्चों को गढ़ भोज की महत्ता एवं इनसे मिलने वाले पौष्टिक तत्वों के बारे में भी बताया। उनके अनुसार हमें अपने परंपरा, पहचान और विरासत को हमेशा कायम रखना होगा।
गढ़ भोज को परोसती हुई स्थानीय वेशभूषा में सजी कनिका गौड़ और ऋषिका ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। उनकी पारंपरिक पोशाक ने गढ़- संस्कृति की असली झलक पेश की

