उत्तराखंड के हरिद्वार से एक बड़ी खबर आ रही है, जहाँ वन भूमि की सुरक्षा को लेकर आर-पार की जंग छिड़ गई है। बंजारेवाला ग्रांट क्षेत्र में क्रेशर संचालकों पर जंगल की जमीन निगलने के गंभीर आरोप लगे हैं। लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब कार्रवाई से बचने के लिए क्रेशर संचालकों ने खुद वन विभाग पर ही भ्रष्टाचार के आरोप मढ़ दिए। क्या यह सच है या फिर ईमानदारी से काम कर रहे अधिकारियों को रोकने की एक सोची-समझी साजिश?ये तस्वीरें हरिद्वार के बंजारेवाला ग्रांट क्षेत्र की हैं। यहाँ विकास की मशीनें अब विनाश की आहट दे रही हैं।

आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर कई क्रेशर संचालक अपनी सीमाओं को लांघकर आरक्षित वन भूमि तक पहुँच चुके हैं। वन्यजीवों के गलियारे में मशीनों का शोर अब सीधा दखल दे रहा है।जहाँ एक तरफ अतिक्रमणकारी हावी हैं वहीं दूसरी तरफ वन विभाग के कुछ जांबाज अधिकारी इस ‘ग्रीन गोल्ड’ को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़े हैं। बीट अधिकारी लव सिंह और तिरपन सिंह अपनी टीम के साथ दिन-रात गश्त कर रहे हैं ताकि जंगल की एक इंच जमीन भी माफियाओं के हत्थे न चढ़े। लेकिन बदले में उन्हें क्या मिल रहा है? उन पर अवैध उगाही के सार्वजनिक आरोप लगाए जा रहे हैं।ग्रामीणों का कहना है कि हम जिलाधिकारी महोदय से मांग करते हैं कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो। हमारे जंगल खत्म हो रहे हैं। जो अधिकारी (लव सिंह और तिरपन सिंह) अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें बदनाम किया जा रहा है ताकि वे पीछे हट जाएं और माफिया अपना काम कर सकें।अब गेंद जिलाधिकारी के पाले में है।

ग्रामीणों ने पत्र लिखकर मांग की है कि वन सीमा का तकनीकी सीमांकन कराया जाए। ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ होना जरूरी है—ताकि यह पता चल सके कि कौन वाकई भ्रष्ट है और कौन ईमानदारी से उत्तराखंड के इन हरे फेफड़ों को बचाने की जंग लड़ रहा है।इस मामले में अब जिलाधिकारी हरिद्वार की टीम क्या एक्शन लेती है और क्या इन जांबाज अधिकारियों को न्याय मिल पाएगा,इस पर हमारी नजर बनी रहेगी।

