उत्तराखंड के मसूरी से 35 किलोमीटर की दूरी पर टिहरी जनपद स्थित धनोल्टी विधानसभा क्षेत्र में माँ सुरकंडा देवी मंदिर कृ जो 51 शक्तिपीठों में गिना जाता हैएक ओर जहां आस्था का केंद्र बना हुआ है, वहीं दूसरी ओर यह स्थल आजकल गंभीर पर्यावरणीय संकट और प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होता नजर आ रहा है। हर दिन हजारों श्रद्धालु माँ के दर्शन को पहुँच रहे हैं, लेकिन मंदिर क्षेत्र और उसके आस-पास प्लास्टिक कचरे, जलते कूड़े और बदबू ने इस पवित्र स्थल की गरिमा को ठेस पहुँचाई है।
स्थानीय दुकानदारों और श्रद्धालुओं के अनुसार, बीते तीन महीनों से क्षेत्र में कोई भी कचरा संग्रहण वाहन नहीं आया। हालात से मजबूर होकर कई दुकानदार खुद ही कूड़े में आग लगा रहे हैं, जिससे धुआं और प्रदूषण फैल रहा है। इससे जंगलों में आग लगने का खतरा भी बढ़ गया है। उन्होने कहा कि सफाई व्यवस्था को लेकर विभागों के बीच जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन है, लेकिन तालमेल की भारी कमी देखने को मिल रही है। मंदिर समिति केवल मंदिर प्रांगण तक ही सीमित है। 2.5 किमी लंबे पैदल मार्ग की सफाई वन विभाग के अधीन है। वहीं कद्दूखाल बाजार की सफाई की जिम्मेदारी जिला और क्षेत्र पंचायत की है। स्थानीय सफाईकर्मियों ने बताया कि जून से अब तक कोई भी गाड़ी कचरा उठाने नहीं आई। इससे पूरा क्षेत्र प्लास्टिक डंपिंग जोन जैसा बन गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, प्लास्टिक जलाने से निकलने वाले डायॉक्सिन और फ्यूरन जैसे जहरीले रसायन न केवल हवा को विषैला बना रहे हैं, बल्कि यह श्रद्धालुओं, वन्य जीवों और आसपास के जंगलों के लिए भी गंभीर खतरा हैं। नवरात्रि के पर्व पर श्रद्धालुओं की संख्या में जबरदस्त वृद्धि हुई है, लेकिन गंदगी, प्लास्टिक और धुएं की दुर्गंध ने यात्रियों को निराश किया है। कई श्रद्धालुओं ने कहा कि इस स्थिति ने उनकी धार्मिक अनुभूति को भी प्रभावित किया है।
स्थानीय लोगों और व्यापारियों ने प्रशासन से मांग की है कि सुरकंडा क्षेत्र को प्लास्टिक मुक्त जोन घोषित किया जाए। एक एकीकृत निगरानी तंत्र बनाया जाए जिसमें सभी संबंधित विभागों की जवाबदेही तय हो। नियमित कचरा संग्रहण और निस्तारण की व्यवस्था लागू की जाए। प्लास्टिक जलाने वालों पर सख्त दंडात्मक कार्यवाही हो युवाओं और स्वयंसेवी संगठनों को जोड़कर स्वच्छता अभियान चलाया जाए ।स्थानीय निवासियों का कहना है कि माँ सुरकंडा देवी केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र भी है। जब लाखों श्रद्धालु किसी स्थान पर आस्था रखते हैं, तो उसकी साफ-सफाई और पर्यावरण सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

