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    Home»उत्तरप्रदेश»बीजेपी नेताओं से अखिलेश की दूरी, बागियों का हिसाब जरूरी
    उत्तरप्रदेश

    बीजेपी नेताओं से अखिलेश की दूरी, बागियों का हिसाब जरूरी

    Social ScanBy Social ScanJuly 25, 2024Updated:January 8, 2026No Comments5 Mins Read
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    लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश की सियासी हालात बदल गए हैं. सूबे में 10 साल तक नंबर वन रहने वाली बीजेपी को 2024 के लोकसभा चुनाव में सियासी झटका लगने के बाद दूसरे नंबर की पार्टी बन गई है तो सपा 37 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी है. ऐसे में अखिलेश यादव ने अपने नेताओं को बीजेपी नेताओं से दूरी बनाए रखने की हिदायत दी है तो राज्यसभा चुनाव के दौरान बगावत करने वालों ने सपा विधायकों की वापसी के दरवाजे बंद कर दिए हैं. इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव के बीच गठबंधन का पाला बदलने वाले आरएलडी चीफ जयंत चौधरी को भी संदेश दे दिया है.

    2024 के चुनावी नतीजे के बाद अखिलेश यादव के हौसले बुलंद हैं और सपा के पक्ष में बने सियासी माहौल को 2027 के चुनाव तक बनाए रखने की रणनीति है. इस कड़ी में बीजेपी नेताओं के लिए सपा में नो-एंट्री का बोर्ड लगा दिया है. पश्चिमी यूपी के एक वरिष्ठ सपा नेता बुधवार को एक बीजेपी नेता को लेकर अखिलेश से मुलाकात कराने के लिए पहुंचे थे, लेकिन सपा प्रमुख ने मिलने से इनकार कर दिया है. इतना ही नहीं उन्होंने अपने नेता को दोबारा से ऐसे न करने की नसीहत दी. इस तरह अखिलेश यादव ने अपने नेताओं को सख्स संदेश देने के साथ-साथ राजनीतिक मैसेज भी देने की कोशिश की है.

    बीजेपी नेताओं से अखिलेश की दूरी

    सपा प्रमुख अखिलेश यादव का पूरा फोकस अभी 2027 के विधानसभा चुनाव पर है, जिसके लिए सियासी तानाबना बुन रहे हैं. ऐसे में बीजेपी नेताओं को लेकर अपने बने माहौल को नहीं बिगाड़ना चाहते हैं. उन्होंने पश्चिम यूपी के अपने एक नेता को बीजेपी से दूर रहने की नसीहत देकर पूरी पार्टी को संदेश दे दिया है. इससे पहले फैजाबाद से सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने पूर्व विधायक जीतेंद्र सिंह बब्लू को सपा में एंट्री कराने के लिए अखिलेश यादव के पास पहुंचे थे और पूरी ताकत लगा दी थी, लेकिन सफल नहीं रहे.

    बीजेपी की एक महिला विधायक भी सपा में अपने लिए जगह तलाश रही है, लेकिन 2027 के चुनाव में टिकट की गारंटी चाहती हैं. सपा प्रमुख ने उन्हें भी अभी तक हरी झंडी नहीं दी है और अब उन्होंने जिस तरह से बीजेपी नेताओं से दूर रहने की चेतावनी दी है, उसके साफ है कि बीजेपी या फिर दूसरे दल के दलबदलू नेताओं को लेकर सपा के पक्ष में बने सियासी माहौल नहीं खराब करना चाहते. दूसरे दलों के नेताओं को लेने पार्टी में लेकर सपा के नेताओं और कार्यकर्ताओ को नाराज नहीं करना चाहते हैं. इसीलिए बीजेपी नेताओं से दूरी बनाए रखने का संदेश सपा प्रमुख दे रहे हैं.

    बागियों के घर वापसी का दरवाजा बंद

    राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा से बगावत कर बीजेपी खेमे के साथ खड़े रहने वाले विधायकों की वापसी के सारे दरवाजा बंद कर दिए हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने साफ-साफ कह दिया है कि सपा के बगावत करने वाले विधायकों को दोबारा से पार्टी में लेने की पैरवी करने वाले नेता को भी बाहर का रास्ता दिखा देंगे. अखिलेश के इन तेवरों के बाद साफ है कि वो बागियों को कतई बख्शने के मूड में नहीं है. इस साल फरवरी में सपा के 8 विधायकों ने राज्यसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के साथ खड़े हो गए थे और लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी का खुलकर प्रचार भी कर रहे थे, लेकिन नतीजे के बाद उनकी तेवर ढीले पड़ गए हैं.

    ऊंचाहार सीट से विधायक मनोज पांडेय ने विधानसभा में सपा के मुख्य सचेतक पद से भी इस्तीफा दे दिया था और चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी की सदस्यता भी ग्रहण कर ली है. इसके अलावा अभय सिंह, राकेश प्रताप सिंह, राकेश कुमार पांडेय, पूजा पाल, विनोद चतुर्वेदी, आशुतोष मौर्य और महाराजी प्रजापति सपा के बागी विधायकों शामिल थी. अखिलेश ने चुनाव के दौरान ही इन सभी बागियों को लेकर सख्त रुख अपनाए रखा था, लेकिन चुनाव के बाद कई बागी नेता दोबारा से सपा में वापसी के लिए जतन कर रहे हैं. ऐसे में अखिलेश यादव किसी भी सूरत में उन्हें लेने के लिए तैयार नहीं है. इस तरह बागियों से हिसाब बराबर कर रहे हैं.

    जयंत को साथ लेने के लिए रजामंद नहीं

    2022 में आरएलडी और सपा मिलकर चुनाव लड़ी थी. अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में आरएलडी को अपने साथ रखने के लिए जयंत चौधरी को राज्यसभा भी भेजा था. 2024 में आरएलडी को सपा 7 सीटें भी देने के लिए तैयार थी, लेकिन जयंत ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतर गए थे. पश्चिमी यूपी में सपा का प्रदर्शन काफी बेहतर रहा है और रालोद भी अपने कोटे की दोनों सीटें जीतने में सफल रही थी. ऐसे में जयंत चौधरी को दोबारा से साथ लेने के सवाल अखिलेश यादव ने कहा कि हमारे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है. न ही मंत्री पद और न ही बजट. ऐसे में हमारे पास देने के लिए कुछ नहीं है तो वो क्यों आएंगे. इसके संकेत साफ है कि जयंत चौधरी के बिना पश्चिमी यूपी में सपा बेहतर नतीजे लाने में सफल रही है तो फिर आरएलडी के साथ गठबंधन क्यों करेंगे. इस तरह अखिलेश यादव फिलहाल कांग्रेस के साथ मिलकर ही 2027 के विधानसभा चुनाव लड़ने का फॉर्मूला बना रखा है.

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